(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.38. अध्यायः 038
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
कृष्णेन युधिष्ठिरंप्रति चार्वाकराक्षसस्य पूर्ववृत्तकथनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 12-38-0x(5421)(66290)
ततस्तत्र तु राजानं तिष्ठन्ते भ्रातृभिः सह।
उवाच देवकीपुत्रः सर्वदर्शी जनार्दनः॥ 12-38-1(66291)
वासुदेव उवाच। 12-38-2x(5422)
ब्राह्मणास्तात लोकेऽस्मिन्नर्चनीयाः सदा मम।
एते भूमिचरा देवा वाग्विषाः सुप्रसादकाः॥ 12-38-2(66292)
पुरा कृतयुगे राजंश्चार्वाको नाम राक्षसः।
तपस्तेपे महाबाहो बदर्यां बहुवार्षिकम्॥ 12-38-3(66293)
वरेण च्छन्द्यमानश्च ब्रह्मणा च पुनः पुनः।
अभयं सर्वभूतेभ्यो वरयामास भारत॥ 12-38-4(66294)
द्विजावमानादन्यत्र प्रादाद्वरमनुत्तमम्।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददौ तस्मै जगत्पतिः॥ 12-38-5(66295)
स तु लब्धवरः पापो देवानमितविक्रमः।
राक्षसस्तापयामास तीव्रकर्मा महाबलः॥ 12-38-6(66296)
ततो देवाः समेताश्च ब्रह्माणमिदमब्रुवन्।
वधाय रक्षसस्तस्य बलविप्रकृतास्तदा॥ 12-38-7(66297)
तानुवाच ततो देवो विहितं तत्र वै मया।
यथाऽस्य भविता मृत्युरचिरणेति भारत॥ 12-38-8(66298)
राजा दुर्योधनो नाम सखाऽस्य भविता नृषु।
तस्य स्नेहावबद्धोऽसौ ब्राह्मणानवमंस्यते॥ 12-38-9(66299)
तत्रैनं रुषिता विप्रा विप्रकारप्रधर्षिताः।
धक्ष्यन्ति वाग्बलाः पापं ततो नाशं गमिष्यति॥ 12-38-10(66300)
स एष निहतः शेते ब्रह्मदण्डेन राक्षसः।
चार्वाको नृपतिश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ॥ 12-38-11(66301)
हतास्ते क्षत्रधर्मेण ज्ञातयस्तव पार्थिव।
स्वर्गताश्च महात्मानो वीराः क्षत्रियपुङ्गवाः॥ 12-38-12(66302)
स त्वमातिष्ठ कार्याणि मा ते भूद्वुद्धिरन्यथा।
शत्रूञ्जहि प्रजा रक्ष द्विजांश्च परिपूजय॥ ॥ 12-38-13(66303)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि अष्टत्रिंशोऽध्यायः॥ 38॥


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